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घोड़ाखाल मंदिर: न्याय के देवता के रूप में जाना जाता है ग्वेल देवता उर्फ गोलू देवता को

मैट्रो प्लस से नवीन गुप्ता की खास रिपोर्ट
घोड़ाखाल (उत्तराखंड), 11 जून:
वैसे तो न्याय पाने के लोग जगह-जगह मारे फिरते है और अलग-अलग दरवाजे खटखटाते रहते हैं लेकिन ग्वेल देवता उर्फ गोलू देवता का घोड़ाखाल मंदिर न्याय पाने के लिए पूरे देशभर में प्रसिद्व है। यही कारण है कि गोलू देवता को न्याय के देवता के रूप में भी जाना जाता है और लोग दूर-दराज से यहां अपनी मन्नत मांगने आते हैं। मन्नत मांगने का भी यहां एक अलग व नायाब तरीका है। लोग अपनी मन्नत यहां मन में नहीं मांगते बल्कि एक कागज/पर्ची पर लिखकर पेड़ पर टांगते है और मन्नत पूरी हो जाने पर मंदिर में घंटी बांधकर न्याय के देवता धन्यवाद प्रकट करते हैं। लोगों की आस्था के प्रतीक इस मंदिर में बंधी लाखों-करोड़ों छोटी-बड़ी घंटियों के कारण इसे घंटियों वाला मंदिर भी कहा जाता है।
ऊंची-ऊंची घुमावदार पहाडिय़ों व गहरी खाईयों के बीचोंबीच समुंद्र तल से 2000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तथा नैनीताल से 16 किलोमीटर व हल्द्वानी से 35 किलोमीटर की दूरी पर बने ग्वेल देवता उर्फ गोलू देवता का घोड़ाखाल मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है जोकि 12वीं शताब्दी का मंदिर बताया जाता है। गोलू देवता का मंदिर बड़ा ही भव्य व आकर्षक है जिसमें प्रवेश करते ही यहां एक अलग तरीके के सुखद की अनुभूति होती है। चारों ओर टंगी घंटियां व भक्तों के कागजों पर लिखी मन्नतों से स्पष्ट अंदाजा लगाया जा सकता है कि देवभूमि में गोलू देवता न्यायी देवता के रूप में पूजे जाते हैं। मंदिर में हर तरफ बंधी हजारों घंटियां लोगों में गोलू देवता की आस्था का प्रतीक है।
मंदिर के मुख्य पुजारी रमेश जोशी ने ग्वेल देवता को बटू भैरव का अवतार बताते हुए बताया कि भक्तजन यहां शनिवार और दोनों नवरात्रों में पूरे देशभर से बड़ी तादाद में आते है और न्याय के देवता के रूप में विख्यात ग्वेल देवता की पूजा कराकर मन्नत मांगते हैं और मन्नत पूरी हो जाने पर श्रद्वास्वरूप घंटी बांधकर गोलू देवता का दिल से आभार प्रकट करते हैं। उन्होंने बताया कि कुमांऊ में गोलू देवता के तीन मूल स्थान है जोकि घोड़ाखाल के अलावा अल्मोड़ा और संभावत में हैं।
गड़ी चंपावत के अवतारी देवता एवं सम्पूर्ण कुमांऊ अंचल में सर्वफलदायी और न्यायकारी देवता के रूप में प्रसिद्व गोरिया ग्वैल, गोरिलनाम से प्रसिद्व देवता की उत्पत्ति कत्यूर वंश के राजा झालराव (झालराही) एवं माता कालिंगी के पुत्र के रूप में की जाती है। राजा के मृत्यु के पश्चात गोरिया ने राज्य में निर्बल व्यक्तियों को कोई ना सताए और आपसी भावना के साथ एवं पूर्वजन्म की बातें जानने के कारण पुजनीय हो गए। राजा बनने के बाद जगह-जगह पर न्याय सभाएं कर न्याय दिलाने के कारण ग्वेल देवता को पूरे कुमांऊ में न्याय देवता के रूप में पूजा जाता है।
काबिलेगौर रहे कि उत्तराखंड का पहला सैनिक स्कूल घोड़ाखाल में ही स्थित है। यह क्षेत्र में एक ऐसा स्कूल है जोकि निश्चित रूप से यात्रा करने लायक है।

घोड़ाखाल मंदिर का इतिहास, मान्यतायें एवं विशेषताये:-
घोड़ाखाल का शाब्दिक अर्थ है घोड़ों के लिए पानी का एक तालाब। घोड़ाखाल एक छोटा सा गांव सुन्दर पहाड़ी क्षेत्र है जोकि मुख्य रूप से पहाड़ी लोगों द्वारा पूजा की गई भगवान गोलू के मंदिर के लिए जाना जाता है। घोड़ाखाल जहां अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विख्यात हैं वहीं यह आध्यात्म व प्रमुख धार्मिक स्थल है।
घोडाखाल मंदिर के गोल्जू देवता की कहानी
किवदंतियों के अनुसार गोलू देवता की उत्पत्ति कत्यूर वंश के राजा झालराई से मानी जाती है जिनकी तत्कालीन राज्य की राजधानी धूमाकोट चंपावत थी। राजा झालराई की सात रानियां होने पर भी वह नि:संतान थे। संतान प्राप्ति की आस में राजा द्वारा काशी के सिद्धबाबा से भैरव यज्ञ करवाया और सपने में उन्हें गौर भैरव ने दर्शन देते हुए कहा कि राजन अब आप 8वां विवाह करो, मैं उसी रानी के गर्भ से आपके पुत्र रूप में जन्म लूंगा।
राजा ने अपना 8वां विवाह कालिंका से रचाया और जल्द ही रानी गर्भवती भी हो गई। उसके गर्भवती होने के कारण सातों रानियों में ईष्या उत्पन्न हो गई। रानियों ने षड्यंत्र रचकर कालिंका को यह बात बताई कि ग्रहों के प्रकोप से बचने के लिए माता से पैदा होने वाले शिशु की सूरत सात दिनों तक नहीं देखनी पड़ेेगी। प्रसव के दिन सातों रानियां नवजात शिशु की जगह सिलबट्टा रख देती है। सातों रानियों ने कालिंका रानी को बताया कि उसने सिलबट्टे को जन्म दिया है। उसके बाद सातों रानी मिलकर कालिका के पुत्र को मारने की साजिश रचने लगी। सर्वप्रथम सातों रानियों ने मिलकर रानी कालिंका के पुत्र के लिए यह योजना बनायीं। वो बालक को गौशाला में फैक देंगे और वो बालक जानवरों के पैर तले कुचलकर मर जाएगा।
सातों रानियां उस बालक को गौशाला में फैंककर चले जाती है। थोड़े समय बाद जब रानियां बालक को गौशाला में देखनें आती है तो वो देखती है कि गाय घुटने टेककर शिशु के मुंह में अपना थन डाले हुए दूध पिला रही है। बहुत कोशिश करने के बाद भी बालक नहीं मरता है। बाद में रानियां उस बालक को संदूक में डालकर काली नदी में फेंक देती है मगर ईश्वर के चमत्कार से संदूक तैरता हुआ गौरीघाट तक पहुंच जाता है।
मछवारे को बालक के दर्शन:.
गौरीघाट में वो संदूक भाना नामक मछुवारे के जाल में फंस जाता है। मछुवारे की संतान ना होने के कारण मछुवारा उस बालक को देखकर प्रसन्न होकर उसे घर ले जाता है। गौरीघाट में मिलने के कारण मछुवारा उस बालक का नाम गोरिया रख देता है। बालक जब बड़ा होने लगा तो वो उस मछवारे से घोड़े लेने की जिद्द करने लगा जाता है। मछुवारे के पास घोड़ा खरीदने के लिए पैसे ना होने के कारण वो बढई से एक लकड़ी का घोड़ा बना लाता है। बालक उस काठ के घोड़े से अत्यंत खुश हो जाता है। एक दिन जब बालक उस घोड़े पर बैठता है तो वह घोड़ा सरपट दौडऩे लगता है। यह नजारा देख गांव वाले चकित रह गए।
बालक की सातों रानियों से मुलाकात:-
एक दिन बालक उसी काठ के घोड़े में बैठकर धुमाकोट नामक स्थान पर पहुंच जाता है जहां सातों रानियां राजघाट से पानी भर रही थीं। वहां बालक अपनी माता कालिंका के प्रति रचे षड्यंत्र की बात रानियों के मुख से सुन लेता है। ये बात बालक जानकर भी उस समय शांत रहता है। वह रानियों के पास जाकर कहता है कि पहले उनका घोड़ा पानी पिएगा, उसके बाद आप पानी भरेंगे। यह सुनकर रानियां हंसने लगती है और कहती है मुर्ख काठ का घोड़ा भी कहीं पानी पी सकता है। उसके बाद बालक बोलता है जब स्त्री के गर्भ से सिलबट्टा पैदा हो सकता है तो कांठ का घोड़ा पानी क्यों नहीं पी सकता। यह सुनकर सातों रानियां घबरा जाती है। रानियां राजा से उस बालक के बारे में शिकायत कर देती हैं। राजा उस बालक को बुलाकर सच्चाई जानना चाहता था तो बालक ने सातों रानियों द्वारा उनकी माता कालिंका के साथ रचे गये षडयंत्र की कहानी सुनाता है। कहानी सुनने के बाद राजा उस बालक से अपने पुत्र होने का प्रमाण मांगता है। इस पर बालक गोरिया ने कहा कि यदि मैं माता कालिंका का पुत्र हूं तो इसी पल मेरे माता के वक्ष से दूध की धारा निकलकर मेरे मुंह में चली जाएगी और ऐसा ही हुआ। राजा ने बालक को गले लगा लिया और उसे अपना राजपाट सौंप दिया। इसके बाद वह राजा बनकर जगह-जगह न्याय सभाएं लगाकर प्रजा को न्याय दिलाते रहे। न्याय देवता के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद वह अलोप हो गए।
गोल्ज्यू देवता के नाम:-
वही बालक बड़ा होकर ग्वेल, गोलू बाला गोरिया तथा गौर भैरव नाम से प्रसिद्ध हुआ। ग्वेल नाम इसलिये पड़ा कि इन्होंने अपने राज्य में जनता की एक रक्षक के रूप में रक्षा की और हर विपत्ति में ये जनता की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से रक्षा करते थे।
गौरीहाट में ये मछुवारे को संदूक में मिले थे, इसलिये बाला गोरिया कहलाये। भैरव रूप में इन्हें शक्तियां प्राप्त थीं और इनका रंग अत्यन्त सफेद होने के कारण इन्हें गौर भैरव भी कहा जाता है। ग्वेल जी को न्याय का देवता भी कहा जाता है। उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले में स्थित चितई गोलू देवता मंदिर का इतिहास और मान्यतायें बिल्कुल एक समान जैसी ही हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार गोल्जू देवता को घोड़ाखाल मंदिर में स्थापित करने का श्रेय महरागांव की एक महिला को माना जाता है। यह महिला वर्षो पूर्व अपने परिजनों द्वारा सतायी जाती थी। उसने चम्पावत अपने मायके जाकर गोलज्यू देवता से न्याय हेतु साथ चलने की प्रार्थना की। इसी कारण गोलज्यू देवता उस महिला के साथ घोडाखाल मंदिर में विराजे। घोड़ाखाल मंदिर की विशेषताएं यह हैं कि श्रद्धालु यहां पर अपनी अपनी मन्नतें कागजों, पत्रों में लिखकर मंदिर में एक स्थान पर टांगते हैं। और माना जाता है कि गोलू देवता उन मन्नतों पर अपना न्याय देकर भक्तों की पुकार सुनते हैं और उनकी मन्नतों को पूरा करते हैं। मन्नतें पूरी होने पर लोग न्यायी देवता के मंदिर में भेट स्वरूप घंटियां चढ़ाते हैं।
यहां एक ऐसी मान्यता भी है कि यदि कोई नव-विवाहित जोड़ा इस मंदिर में दर्शन के लिए आता है तो उनका रिश्ता सात जन्मों तक बना रहता है। उत्तराखंड के अल्मोड़ा और नैनीताल जिले में घोड़ाखाल मंदिर स्थित गोलू देवता के मंदिर में केवल चि_ी भेजने से ही मुराद पूरी हो जाती है। इतना ही नहीं गोलू देवता लोगों को तुरंत न्याय दिलाने के लिए भी प्रसिद्ध हैं।


ग्वेल देवता उर्फ गोलू देवता का घोड़ाखाल मंदिर

ग्वेल देवता उर्फ गोलू देवता
ग्वेल देवता उर्फ गोलू देवता के घोड़ाखाल मंदिर में मन्नत रूपी पेड़ पर टंगी पर्चिंया और मन्नत पूरी होने पर बंधी घंटियां।



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