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अरावली पर्वतमाला: क्या कांत इंक्लेव और खोरी की तरह हो पाएगी PLPA जमीन पर अवैध रूप से बने शिक्षण संस्थानों, फार्म हाऊसों आदि पर कार्यवाही?

जल, जंगल और जमीन की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में आखिरी दौर में, देखिए होता है क्या?
मैट्रो प्लस से नवीन गुप्ता की खास रिपोर्ट
फरीदाबाद, 6 अगस्त:
अरावली की श्रंखलाओं में जल, जंगल और जमीन की लड़ाई संभवत: आखिरी दौर में चल रही है। इसी के साथ क्या सुप्रीम कोर्ट से आज उन लोगों को राहत मिल पाएगी जिन्होंने हरे-भरे पहाड़ों पर JCB का पीला पंजा चलाकर और बारूद से ब्लास्टिंग कर अरावली का चीरहरण किया हुआ है, इसको लेकर संशय बना हुआ है। हरे-भरे जंगलों को काटकर वहां बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान, होटल, आलीशान फार्म हाऊस/बैंक्वेट हॉल आदि बनाकर कंकरीट की ईमारतें खड़ी करने वालों ने जिस प्रकार से प्रकृति/नेचर से खिलवाड़ किया, उसका खमियाजा लोग अलग-अलग रूपों में भुगत रहे हैं।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने इस मामले में अभी तक तो कड़ा रूख अपनाते हुए अपने आदेशों में स्पष्ट रूप से कह दिया है कि जंगल को जंगल ही रहने दो, यहां किसी भी प्रकार का अवैध निर्माण/अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं होगा। लेकिन चंद फार्म फार्म हाऊसों और शिक्षण संस्थानों को जिन्होंने कोर्ट से स्टे ले रखा है, को सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट की उक्त खंडपीठ ने आज शुक्रवार को 2 बजे सुनवाई के लिए समय दे रखा है जिसमें स्टे धारकों को यह साबित करना होगा कि वो वन क्षेत्र में काबिज नहीं हैं। इसलिए अब पूरे प्रदेश के नौकरशाहों, राजनेताओं, उद्योगपतियों की नजर अब सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले पर टिकी है खासतौर पर जो यहां नामी-बेनामी रूप से काबिज हैं।
बता दें कि हरियाणा के कद्दावर नेताओं ने फरीदाबाद के अरावली पहाड़ में वन क्षेत्र की ज़मीनों को न सिर्फ फॉॅर्म हाउसों बल्कि प्राइवेट शिक्षण संस्थानों, आश्रमों, मंदिरों को लुटा डाला। अरावली के खोरी में नगर निगम फरीदाबाद (MCF) द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हजारों मकानों को तोड़कर लाखों गरीब मजदूर परिवारों को उजाड़ते हुए बेघर कर दिया गया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मानवता के नाते ऐसे लोगों के पुर्नवास के लिए हरियाणा सरकार को कहा है।
वहीं दूसरी तरफ अब इसी अरावली में अवैध रूप से कई शिक्षण संस्थानों, मंदिरों, फार्म हाऊसों, होटलों आदि पर अब तोडफ़ोड़ की तलवार लटकी हुई है क्योंकि ये सभी अवैध बिल्डिंगें सुप्रीम कोर्ट के राडार पर हैं। दस्तावेज बता रहे हैं कि हरियाणा में लागू पंजाब भूमि संरक्षण कानून (पीएलपीए)1900 की धज्जियां उड़ाकर मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट, अरावली इंटरनेशनल स्कूल, मॉडर्न विद्या निकेतन स्कूल सहित उन सभी फार्म हाऊस, होटलों आदि को बनने दिया गया जिन पर अब सुप्रीम कोर्ट के द्वारा तोडफ़ोड़ की तलवार लटकी हुई है।
वहीं खोरी और लकड़पुर में गरीब मज़दूरों को उजाड़ते हुए एमसीएफ के अफसरों ने कहा था कि ये बस्तियां वन विभाग की जमीन पर अवैध रूप से बनी हैं, जिनमें पीएलपीए कानून को तोड़ा गया है।

  • सरकारी जमीन पर शिक्षा के अवैध महल:-
    अरावली में मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, मॉडर्न विद्या निकेतन (MVN) स्कूल और अरावली इंटरनेशनल स्कूल की बिल्डिंगों को जिन लोगों ने देखा होगा, उन्हें लगा होगा कि इसके मालिकों ने बड़ी मेहनत से इन इमारतों को खड़ा किया होगा। लेकिन जिस जमीन पर ये भव्य इमारतें खड़ी हैं, आरोप है कि उन्हें गलत ढंग से हासिल किया गया है। भजनलाल से लेकर देवीलाल, बंसीलाल, ओमप्रकाश चौटाला और भाजपा राज में इन जमीनों पर खुलकर अवैध निर्माण हुआ। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई बंधुआ मुक्ति मोर्चा की याचिका के साथ लगाए गए दस्तावेजों के जरिए जब पड़ताल की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
    मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी जिस जमीन पर है, उसका खसरा नंबर 35//1/2, 2, 3/1, 8/2, 9, 10/1, 11, 12, 19/2, 20, 36, 16/1 राजस्व क्षेत्र मेवला महाराजपुर है।
    MVN स्कूल जिस जमीन पर है, उसका खसरा नंबर 37(62-16-17), 38 (11-1-19-20-2), 14 (2) और राजस्व क्षेत्र मेवला महाराजपुर का गैर-मुमकिन पहाड़ इसमें शामिल है।
    अरावली इंटरनेशनल स्कूल का खसरा नंबर 34 (1-10-12),् 35(4-5-6-7) राजस्व क्षेत्र मेवला महाराजपुर है।
    बता दें कि जिन जमीनों पर शिक्षा की इन इमारतों को खड़ा किया गया है, वहां PLPA कानून लागू है। ध्यान रहे कि पीएलपीए कानून जहां लागू होते हैं, वह जगह वन क्षेत्र होता है और इसी के तहत इन जमीनों का मालिकाना हक वन विभाग हरियाणा सरकार के पास है। इन जमीनों पर न तो पेड़, पौधे काटे जा सकते हैं, न कोई निर्माण किया जा सकता है और न ही खनन हो सकता है।
    यहां यह भी साफ कर देना ठीक होगा कि सन् 2004 में पर्यावरणविद् एमसी मेहता बनाम भारत सरकार के केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने इन जगहों को PLPA के तहत यानी वन क्षेत्र माना था और इसी वजह से कांत एनक्लेव पर तोडफ़ोड़ की कार्रवाई हुई थी। कांत एनक्लेव भी PLPA लैंड पर बना था और हाल-फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर खोरी में तोडफ़ोड़ जारी है।
    बता दें कि अरावली के अधिकांश फार्म हाउस PLPA लैंड पर हैं। बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने अपनी याचिका के साथ उस ऐतिहासिक फैसले की कॉपी लगाई थी। फैसले में कहा गया है कि हरियाणा सरकार की इस दलील को अदालत नामंजूर करती है कि पीएलपीए लैंड वन क्षेत्र नहीं है। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने उसी समय अरावली और दिल्ली-फरीदाबाद सीमा के पांच किलोमीटर क्षेत्र में बोरिंग पर भी पाबंदी लगा दी थी।
    एमसी मेहता बनाम भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का यह अंश अपनी कहानी खुद बताता है- ”हमें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हरियाणा सरकार ने अरावली में जिन जमीनों को PLPA में नोटिफाई किया है वे वन और वन क्षेत्र की जमीनें हैं। हकीकत यह है कि खुद हरियाणा सरकार अरावली को कई दशक से वन क्षेत्र मानती रही है। उसके तमाम दस्तावेज इसके सबूत हैं। इसलिए इस वैधानिक स्थिति को बदलने या इसमें कोई संशोधन करना अदालत जरूरी नहीं समझती। वो बात अलग है कि हरियाणा सरकार ने सन 2019 में पीएलपीए-1900 को संशोधित कर उसमें वन क्षेत्र को कम करते हुए जो पीएलपीए-1901 बनाया था, उस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया था जिस वजह से संशोधित कानून अधर में ही लटक गया।
    सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले में यह भी साफ किया था कि अगर इस इलाके और खासकर पीएलपीए जमीनों पर कोई निर्माण किया गया हो तो उसे अवैध घोषित करते हुए गिरा दिया जाए। वहीं हाल ही में 3 अगस्त के अपने आदेशों में भी सुप्रीम कोर्ट ने वन क्षेत्र से हर प्रकार के अवैध निर्माण को तोडऩे के आदेश निगमायुक्त को दे दिए हैं।
    केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने भी खोला भेद:-
    मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, मॉडर्न विद्या निकेतन (MVN) स्कूल और अरावली इंटरनेशनल स्कूल वन विभाग हरियाणा की जमीन पर हैं, इसकी पुष्टि कुछ और तथ्यों की पड़ताल से भी होती है, जिसमें केंद्रीय पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का पक्ष स्पष्ट है। बंधुआ मुक्ति मोर्चा के रमेश आर्य ने 22 और 23 जनवरी 2020 को आरटीआई के तहत केंद्रीय पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पूछा था कि क्या मंत्रालय ने इन तीनों शिक्षण संस्थानों को कोई एनओसी (अनापत्ति प्रमाणपत्र) और वन क्षेत्र को अनारक्षित घोषित करने का कोई प्रमाणपत्र जारी किया है। इसके जवाब में केन्द्र सरकार के इस मंत्रालय ने 14 फरवरी, 2020 को जवाब दिया कि इस तारीख तक अब तक 12 प्रस्ताव हरियाणा सरकार ने एनओसी और अनारक्षित घोषित करने के लिए भेजे हैं। मंत्रालय ने इन 12 प्रस्तावों में से तीन पर विचार किया, लेकिन इन तीनों शिक्षण संस्थानों का जिक्र मंत्रालय की सूची में नहीं हैं।
    इसके बाद 27 अगस्त, 2020 को आरटीआई के तहत एमसीएफ से पूछा गया कि क्या नगर निगम फरीदाबाद ने इन तीनों संस्थानों को चेंज ऑफ लैंड यूज (CLU) में बदलाव की अनुमति दी है? क्या इन तीनों संस्थानों ने वन विभाग से कोई एनओसी हासिल की है? MCF ने इस RTI का जवाब 27 सितंबर, 2020 को देते हुए लिखा कि अभी तक वन विभाग ने मानव रचना और MVN को एनओसी देने की जानकारी MCF को नहीं दी है, लेकिन MCF ने अरावली इंटरनेशनल के बारे में जिला योजनाकार (DTP फरीदाबाद) से सूचना मांगी है। अलबत्ता MCF ने इन तीनों शिक्षण संस्थानों को CLU प्रमाण पत्र जारी कर दिया।
    बहरहाल, 27 अगस्त 2020 को RTI के तहत डिप्टी कंजरवेटर वन (DCF) फरीदाबाद से पूछा गया कि क्या इन तीनों शिक्षण संस्थानों ने विभाग से इन जमीनों का इस्तेमाल गैर-वन वाले (नॉन फॉरेस्ट) क्षेत्र के तहत इस्तेमाल की अनुमति मांगी है।
    वन विभाग के अफसर ने इस आरटीआई का जवाब 19 अक्तूबर, 2020 को देते हुए लिखा कि इन तीनों शिक्षण संस्थानों ने PLPA लैंड पर अपनी बिल्डिगें खड़ी की हैं। अधिकारी ने कहा कि यह मामला वन संरक्षण कानून के तहत देखा जाना चाहिए। इन तीनों शिक्षण संस्थानों को गैर-वन कामों के लिए कोई प्रमाणपत्र जारी नहीं किया गया है। वहीं पिछले दिनों जिला उपायुक्त के साथ हुई एक प्रैस कांफ्रेस में DFO राजकुमार ने स्पष्ट रूप से उक्त शिक्षण संस्थानों को अवैध करार देते हुए तोड़े जाने की बात कही थी।
    बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट में आज शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई शुरू होने पर नगर निगम फरीदाबाद को NOC/CLU के बारे में स्थिति स्पष्ट करनी होगी जिसकी रिपोर्ट नगर निगम द्वारा राज्य सरकार को भेज दी गई है।
    नगर निगम पर यह भी सवाल खड़ा हो रहा है कि जब उक्त जमीन पीएलपीए में आती है तो उसने किस तरह मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, मॉडर्न विद्या निकेतन (MVN) स्कूल और अरावली इंटरनेशनल स्कूल को CLU जारी कर दिया। अरावली में सूरजकुंड का यह इलाका ज्वाइंट कमिश्नर एमसीएफ के कार्य क्षेत्र में आता है। ऐसे में देखना है कि वे सुप्रीम कोर्ट में इस बाबत कल क्या तथ्य रख जाते हैं। पीएलपीए पर इमारतें कैसे खड़ी की जा सकती हैं। फिलहाल इसका माकूल जवाब MCF अफसरों के पास नहीं है। वैसे सुप्रीम कोर्ट में तथ्यों को छिपाने या तोड़-मरोड़ कर पेश करने की हिम्मत MCF के अफसर नहीं जुटा पाएंगे।
    अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट कांत एन्क्लेव और खोरी की तरह ही मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, मॉडर्न विद्या निकेतन (MVN) स्कूल और अरावली इंटरनेशनल स्कूल सहित अवैध रूप से बने सभी निर्माणों को गिराने का आदेश देता है या फिर मोटा जुर्माना लगा कर छोड़ देता है।
    अलबत्ता खोरी और लकड़पुर में जिन गरीब मजदूरों को उजाड़ा जा चुका है, वे अब यहां नहीं बस पाएंगे, ये तो स्पष्ट हो चुका है।




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